पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४५८

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भाषाकी अनस्थिरता खैराद पर नहीं चढ़ाया है, उनकी भाषा सौ सालके बाद क्या आज भी न समझी जा सके तो आश्चर्य नहीं । सरस्वतीके उसी अङ्कमें एक वाक्य है-"इसमें कोई सन्देह नहीं कि पण्डित बलदेवप्रसादके शरीरके साथ हिन्दीका एक बहुत अच्छा लेखक हमेशाके लिये तिरोहित होगया।" इस वाक्यके लेखकजी महाराजका मतलब तो यह है कि पण्डित बल- देवप्रसाद हिन्दीके अच्छे लेखक थे, वह उठ गये । पर इससे अर्थ निकलता है यह कि पं० बलदेवप्रसादका शरीर भी तिरोहित होगया और उसके साथ हिन्दीका एक अच्छा लेखक भी हमेशाक लिये तिरोहित होगया। लेखकने एक अंगरेजी बोतलका टुकड़ा पीसकर हिन्दीकी खिचड़ीमें मिलाना चाहा है ! यह वाक्य उसी तरह दुलत्तियां झाड़ रहा और रस्सियां तुड़ा रहा है, जिस तरह दो शऊरदार बाप बेटों- की सवारीका जानवर एक बांसमें बंधा हुआ, उनके कन्धेपर लटकता हुआ एक पुलपरसे जाते समय झाड़ और तुड़ा रहा था। द्विवेदीजीको “को" की बड़ी बीमारी है ; ऊपरके वाक्यमें है- "बहुतसे वाक्योंको न समझ सक।” सीधी बात है-“बहुतसे वाक्य न समझ सक" 'को' इसमें फालतू है। जिनको हिन्दी जाननेवालोंकी सोह- बत नहीं, वह इसी तरह “को" की भरमार करते हैं। अर्द्ध कोको बनना उनकी आदत हो जाती है। ___ आगे लिखने और बोलनेकी भाषाका भेद बतानेकी चेष्टा द्विवेदीजी करते हैं। पर भाषापर आपको अधिकार नहीं। इससे सौ साल बीतने- से पहले आज ही उनकी बात समझनेके लाले पड़ रहे हैं। जरा आपका इरशाद समझनेमें जोर लगाइये -"लिखने और बोलनेकी भाषामें कुछ भेद होता है । लिखनेकी भाषा थोड़ी बहुत अस्वाभाविक होती है और लेखकके प्रयत्न और परिश्रमसे सिद्ध होती है। पर बोलनेकी भाषा स्वाभाविक होती है। उसके प्रकाशन (प्रगटन नहीं ?) में किसी तरहकी [ ४४१ ]