पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४६३

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना कोई उनसे मुखातिब हो जाय, फिर पीछा छुड़ाना कठिन है। व्याकरणसे भाषाकी उन्नति रुकती है इस बातको आप दूरतक समझाते आये हैं। पर आपकी तसल्ली नहीं होती। इससे फिर कहते हैं- "इस कारण बोलनेको भाषाको व्याकरणकी शृङ्खलासे बांधनेकी जरूरत नहीं। उसे यथेच्छ सञ्चरण करने देना चाहिये। और ( अजागलस्तन ) उसका व्याकरण बन भी नहीं सकता क्योंकि जो भाषा परिवर्तनशील है, उसका व्याकरण बनावैगा कोई कितनी दफा ? ( वाह ! वैगा और दफाके दोनों पलड़े भी कैसे बराबर हैं ! ) जा प्रयोग या जो वाक्य, या जो मुहाविरा आजकल व्याकरणसिद्ध और सर्वसम्मत है, (अजी महाराज ! मुहाविरा व्याकरणसिद्ध कैसे होता है। किसीसे इस कमबख्त शब्दके मानी तो पूछ लीजिये। ) वही कुछ काल बाद निषिद्ध माना जायगा। तो क्या उस समय फिर एक नया व्याकरण बनेगा ? (नहीं साहब नहीं बनेगा, आपकी दलील पत्थरकी लकीर है। पर आप जैसे हिन्दीदांको “तो” और “तब" का प्रयोग ठीक नहीं मालूम यह कैसे गजबकी बात है। आप इस तरह कहिये-"तब क्या फिर एक नया व्याकरण बनेगा ?" ऐसा लिखनेमें वाक्य गठ गया। आपका "तो" "उस समय" को साथ लेकर रफू- चक्कर हुआ। क्योंकि "तब" कहनेमें ही “तो उस समय" आ गया। आप सच जानिये कि अच्छी भाषा लिखनेवाले वाक्यको छोटा करके लिखना, आपकी व्याकरणदानीकी पावन्दीसे भी कहीं बढ़कर समझते हैं।) नहीं, यदि इस तरह नये-नये व्याकरण बनते रहेंगे तो अनन्त व्याकरणोंकी जरूरत होगी।” (निहायत ठीक यह इरशाद आपका है, किसी दलील या नजीरकी जरूरत आपने बाकी नहीं छोड़ी।) उन्नति करती हुई अर्थात् बोलनेकी भाषाके लिये व्याकरण नहीं बनना चाहिये इस बातको बहरे-तवीलमें समझा कर आप