पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४६७

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना और डूबतेहुए धर्मकी रक्षा करनेके लिये। इसी प्रकार द्विवेदीजीके भक्तोंने जाना है कि डूबती हुई हिन्दी भाषाके उद्वारके लिये आपने यह लीला की है। आप स्वयं भी आज्ञा करते हैं-"इसीसे हिन्दीकी दशा अनस्थिर हो रही है। (यह अनस्थिर अनस्थिरताका बड़ा भाई है।) एक तो हिन्दी भाषामें साहित्यका एक प्रकारका अभाव ही है। (और दुःखकी बात यह कि आप जैसे दिग्गज विद्वानोंके जीते जी !) दूसरे उसकी अनस्थिरता उसे और बरबाद कर रही है ।" किसे ? हिन्दी भाषा- को या उसके साहित्यको। आत्मारामकी समझमें तो यह अभागी अनस्थिरता आपकी बुद्धिको बरबाद कर रही है। “जिस अखबारको उठाइये, जिस पुस्तकको उठाइये, सबकी (जी नहीं, उसीकी कहिये । सबकी कहना था तो 'जिस'को ताकमें रहने दिया होता। आपहीकी व्याकरणदानीकी रक्षाके लिये कहना पड़ता है। नहीं तो बड़ोंका कथन है कि टका दीजिये, अकल न दीजिये। ) वाक्य रचनामें आपको भेद मिलेगा। व्याकरणके नियम निश्चित न होनेसे सब अपने-अपने क्रमको ठीक समझते हैं। इसकी तरफ लोगोंका बहुत कम ध्यान जाता है कि हमारा वाक्य व्याकरणसिद्ध है वा नहीं।" स्वयं द्विवेदीजीको यह बीमारी सबसे अधिक है। आप अपने क्रमको ठीकही नहीं मानते, दूसरोंको लठके जोरसे सिखाना भी चाहते हैं। यहांतक तो आप तर्करूपी मोहमिलापका ढेर लगाते रहे, अब उदा- हरण सुनिये और आपकी वाक्यरचनाके बागड़बिल्लापनकी प्रशंसा करते चलिये। आप देखेंगे कि एक वाक्य आंगनमें है तो दूसरा दालानमें और तीसरा छज्जेपर। “यहां पर हम व्याकरणविरुद्ध हिन्दीरचनाके दो चार उदाहरण देना चाहते हैं। ( नाहक कष्ट करते हैं, आपका पूरा लेखही उसका उदाहरण है। ) पर जिनकी रचनाके वे उदाहरण हैं ( कौन से प्रभु ? अभी तो वह आपके पेटहीमें विराजमान हैं। यह "वे" कहां [ ५० ।