पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४७१

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना अलग-अलग न हों दो कैसे कहलायगे ? खैर, इसके लिये खिसियानेकी जरूरत नहीं । आप भूलना और दूसरोंकी भूलें पकड़नेके लिये बकध्यान लगाना ही आपकी श्रेणीके विद्वान परम विद्वत्ता समझते हैं । अच्छा महाराज । यदि आपके 'छापनेका' की जगह केवल 'का' या 'पर' होता तो वाक्यकी शिथिलता जाती रहती कि नहीं ? आप और फरमाते हैं-"फिर छापैके पहले एक सर्वनाम भी अपेक्षित है। यहांपर मतलब 'पुस्तकोंको छापै' से है । पर यदि सर्वनाम भी कोई चीज है तो पुस्तकों- की जगहपर 'उन्हें' या 'उनको' जरूर आना चाहिए।" जी नहीं, उन्हें या उनको आनेकी कुछ जरूरत नहीं। जब मतलब साफ है तो एक व्यर्थ शब्द क्यों बढ़ाया जाय ? ऊपर तो पुस्तकोंकी बात साफ है, फिर आपको “उनको” की क्या जरूरत ? स्पष्ट तो है कि मेरी पुस्तकोंका कुल अधिकार बाबू रामदीनसिंहको है और कोई न छापे । फिर “उनको" के बिना आपके सर्वनामकी इज्जत क्यों नहीं रहती ? दरअसल यह है, हिन्दी आप समझतेही कम हैं। पहले तो आपन “को” को बिना पहचाने ही उसके आगे “आपने" जोड़नेकी आज्ञा दी। अब “उनको" और जोड़ने- की जबरदस्ती कर रहे हैं। जान पड़ता है कि “को' से आपको बड़ी प्रीति है । इससे “का” की जगह “को” और एक और “को” जोड़कर एक खासा “को को" बना लिया । खैर, परम भाषा दिग्गज होनेपर भी द्विवेदीजीमें उदारताका लेश है, यह बड़े सन्तोषकी बात है। हरिश्चन्द्रकी इतनी भारी भूल पकड़नेपर भी आप कहते हैं- “सम्भव है, बाबू हरिश्चन्द्रने इस वाक्यको (नहीं नहीं यह वाक्य कहिये, फिर वही 'को'!) ठीक लिखा हो, पर ( कतर डालिये ) छापेवालोंकी असावधानीसे यह त्रुटियां रह गई हों ।” अहा ! कितना चौड़ा हृदय द्विवेदीजीको ईश्वरने दिया है ! हिन्दी लेखकोंसे उन्हें अगाध प्रेम न होता तो क्या कभी उनकी लेखनीसे यह वाक्य निकलते ? एक तो काशी ऐसा स्थान है, [ ४५४ ]