पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४७३

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचन 4- 'बकरीविलापकी' बकरीमें ब की जगह व हो गया है। ब और व में भेद है। यदि भेद न होता तो एक के बदले दो वर्णों की जरूरत ही क्या थी ?" आपकी बात बिलकुल सच्ची है । सचमुच ब और व में भेद है। पर इस भेदपर भी आपने वकरीको ठीक बकरी समझ लिया, यह आपकी बुद्धिकी सख्त बहादुरी है। क्योंकि बकरीकी ठीक पहचान चरवाहों, गड़ेरियों या उन लोगोंहीको होती है, जो देहातमें जन्म लेते हैं और बस्तीसे अलग बस कर एकान्तमें जीवन बिताते हैं। ऐसे लोगों- के पास बड़े-बड़े बुद्धिमान शिक्षा लेने जाते हैं। पण्डित श्रीधर पाठकने ऐसे एक गड़ेरियेकी कहानी लिखी है जिसके पास एक आलिम शिक्षा लेने गया था। उस कहानीका आरम्भ यों है- __ "बसा बस्तियोंसे था दूर एक किसान ।” और एक बात है । वा की जगह बा और ब की जगह व हो जानेसे द्विवेदीजीका लाभ है, चाहे हिन्दीके मृत लेखकोंकी स्वर्गमें कुछ निन्दाही होती हो । आपकी लियाकतके झंडे गड़ गये । 'ब' ने बहुत प्रसन्न होकर कहा है कि द्विवेदीजी बड़े बहादुर हैं और 'व' ने कृतज्ञता प्रकाश करके कहा है कि वाह ! आपकी क्या बात है। द्विवेदीजीके बिना यह सूक्ष्म विचार कौन करता । आपसे वादी भी प्रसन्न और प्रतिवादी भी प्रसन्न ! ___ हरिश्चन्द्रको द्विवेदीजी कहांतक क्षमा करें। एक खता माफ कर सकते हैं। पर जब खतापर खता देखी तो उनका कलेजा पक गया। हरिश्चन्द्रका और एक जुल्म द्विवेदीजी दिखाते हैं-"सामासिक शब्दोंको इकट्ठा लिखनेकी तरफ भी लोगोंका कम ध्यान है । 'बकरी विलाप' एक सामासिक शब्द है। पर हरिश्चन्द्रजीको पुस्तकमें जो सन् १८८६ ई० की छपी हुई है, इसके दो खण्ड कर दिये गये हैं।” कसे गजबकी बात है कि जीते जी तो हरिश्चन्द्र अपना मसविदा एकबार लिखकर फेंकनेके बाद [ ४५६ ]