पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४७६

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भाषाकी अनस्थिरता से। द्विवेदीजी जो इसमें एक जगह 'बिजुली' और दो जगह 'वह' घुसेड़ते हैं, इससे राजा साहबके वाक्य स्पष्ट हो गये या गुट्ठल ? राजा साहबके वाक्योंमें जब बिजली हीकी बात कही गई है, तो बार-बार बिजलीका नाम लेनेकी जरूरत क्या है ? बिजलीकी बात समझते- समझते कोई हाथीकी बात तो समझने नहीं लगेगा। द्विवेदीजीको क्या समझाया जाय, वह जिसको नहीं जानते हैं, उसीकी बाबत समझ बैठे हैं कि उसे खूब जानते हैं। फारसीमें इसे 'जहलेमुरकब' कहते हैं। फारसीवाला कहता है कि जो नहीं जानता और समझता है कि जानता हूं, वह सारी उमर जहलेमुरक्कबमें रहता है। राजा साहबके ऊपरवाले वाक्य इतने शुद्ध और सुन्दर हैं कि उनसे बढ़कर और नहीं हो सकते। यदि वर्तमान हिन्दीका वर्तमान रूप दो चार सौ वर्ष रहना बदा हो, तो राजा साहबके यह वाक्य भी बने रहेंगे और अच्छी हिन्दीका नमूना कहलावंगे। ___ द्विवेदीजी वैयाकरण बनकर तो चले, पर चलते हैं वैयाकरणोंके पथके विपरीत । वैयाकरण लोग अपनी भाषामें आधी मात्रा घटा सकनेसे पुत्र होनेकी खुशी मानते हैं, आप तो संस्कृतके बड़े पण्डित हैं, देखिये संस्कृतवाला क्या कहता है- ___"अर्द्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवमन्यन्ते वैयाकरणाः” । पर द्विवेदीजी एक मात्राही क्यों, अक्षरके अक्षर जबरदस्ती बढ़ाडालने- को अपनी व्याकरण-वीरता समझते हैं ? आपको मालूम होना चाहिये कि राजा शिवप्रसाद उर्दू के ऊंचे दरजेके लेखकोंमें थे। सर सैयद अहमदखां आदि उनकी उर्दूकी कदर किया करते थे। सर सैयद उर्दूके स्तम्भ-स्वरूप ऊंचे दरजेके लेखक थे। अच्छी उर्दूका उन्हें यहां तक प्रेम था, कि वह अपने बेटे जष्टिस महमूदकी उर्दूको उर्दू नहीं समझते थे। कहा करते थे, कि तुमने दिल्लीमें रहकर उर्दू नहीं सीखो, तुमअच्छी उर्दूको [ ४५९ ]