पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४७७

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना क्या समझ सकते हो ? राजा शिवप्रसादकी ऊपरवाली भाषा कितनी फसोह है, उसका हम मौलवी मुहम्मद हुसेन आजादकी भाषासे मुकाबिला करके दिखाते हैं। यह मुहम्मद हुसेन वही हैं, जिनके बनाये उर्दूके इतिहास आबेहयातको सब उर्दूवाले सिर आंखोंपर रखते हैं। पञ्जाब यूनिवर्सिटीमें आदिसे आजतक उन्हींका बनाया उर्दूका व्याकरण पढ़ाया जाता है। उर्दू हीका नहीं, फारसीका व्याकरण भी पञ्जाब यूनिवर्सिटीमें उन्हींका बनाया जारी है। उनकी दरबारे-अकबरी नामकी किताबसे हम कुछ पंक्तियां उद्धृत करते हैं--- "हम सब एक ही मञ्जिले मकसूदके मुसाफिर हैं। इत्तिफाकन गुजरगाहे दुनियामें एकसा हो गये हैं। रस्तेका साथ है। बना बनाया कारवान चला जाता है। इत्तिफाक और मिलनसारीके साथ चलोगे, हमदर्दीसे काम बटाते चलोगे, तो हंसते-खेलते रस्ता कट जायगा। अगर ऐसा न करोगे और इन झगडालुओंके झगड़े तुम भी पैदा करोगे, तो नुकसान उठाओगे। आप तकलीफ पाओगे, साथियोंको भी तकलीफ दोगे।" अब यदि द्विवेदीजीका व्याकरण लेकर मौलवी मुहम्मद हुसेनकी भाषाकी इसलाह की जाय, तो इस प्रकार हो–“हम सब एक ही मञ्जिले मकसूदके मुसाफिर हैं । हम सब इत्तिफाकन गुजरगाहे दुनियामें एक-सा हो गये हैं। हम सबका रस्तेका साथ है। हम सबका बना बनाया कारवान चला जाता है। अगर तुम इत्तिफाक और मिलनसारीके साथ चलोगे, अगर तुम हमदर्दीसे काम बटाते चलोगे, तो हंसते-खेलते हम सबका रस्ता कट जायगा। अगर तुम ऐसा न करोगे और इन झगड़ालुओंके झगड़े तुम भी पैदा करोगे, तो तुम भी नुकसान उठाओगे। तुम आप भी तकलीफ पाओगे और तुम अपने साथियोंको भी तकलीफ दोगे।” इसमें ३ 'हम सब' और १ 'हम सबका' १ 'अगर' ४ 'तुम' [ ४६० ]