पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४७८

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भाषाकी अनस्थिरता १ 'तुम भी' और 'तुम" ( कुछ भूल-चूक रह गई हो, तो द्विवेदीजी माफ करें) बढ़ गया। इससे जो लोग भाषा जानते हैं, भाषा बोलना जानते हैं, वह तो आपके व्याकरणसे काम ले सकगे नहीं। हां, गाँव-गॅवईके पांच पञ्च मिलकर आपके व्याकरणको देहातमें रिवाज दिलानेके लिये आन्दोलन कर, तो शायद कुछ सफलता हो सकती है। और दो-चार पंक्तियां हम लखनऊके "अलनदवा” नामके पत्रसे नकल करते हैं। यह भारतवपके मुसलमान विद्वानोंकी एक सभाका पत्र है। शमसुलउल्मा मौलवी शिवली इसके सम्पादक हैं, जो अरबी- फारसीके एक बड़े विद्वान और उदृके प्रवीण सुलेखक हैं। उक्त पत्रके एक लेखकी दो-तीन पंक्तियाँ नकल की जाती हैं—“मिसरकी तालीम याफ्ता सोसाइटीके एक जीअसर मेम्बर मि० कासिम अमीनविक हैं, जो किसी जमानेमें पर्देके बड़े तरफदार थे और युरोपकी मौजूदा आजादोको सख्त नफरतकी निगाहसे देखते थे । फरेञ्चमें एक रिसाला भी पर्दये इसलामको ताईदपर लिखा था।” यदि द्विवेदीजीके व्याकरणसे इन पंक्तियोंको ठीक किया जाय, तो इसमें एक 'वह' और एक 'उन्होंने' जोड़नेकी जरूरत पड़ती है ; पर जरूरत नहीं है, इसीसे लेखकने उनको छोड़ दिया है। हिन्दीमें क्रियासे बहुत-सा काम निकल जाता है। क्रिया बहुत स्थानोंपर आपही कर्ताका बोध करा देती है। द्विवेदीजीका ध्यान शायद इधर कम है। कदाचित् पाठक यह कहें कि राजा साहबकी हिमायतके लिये उर्दू- वालोंके उदाहरण क्यों दिये गये हैं ? इसका उत्तर आत्मारामकी तरफसे यह है कि हिन्दीवालोंको तो द्विवेदीजी खयालमें लाते ही नहीं। हिन्दीमें बड़े-से-बड़े लेखक हरिश्चन्द्र थे, उन्हींको महाराजजीने सबसे पहले धर लपेटा है। फिर मुद्रा-राक्षस और सत्य हरिश्चन्द्र आदिसे हम उदाहरण दें, तो क्या मुंह लेकर ? देवनागरी अक्षरोंके प्रवर्तक राजा [ ४६१ ]