पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४८२

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भाषाकी मनस्थिरता दिये गये हैं, जिनके अलग होजाने पर भी वाक्यका मतलब वैसेका वैसा है। पर ऐसे वाक्य बोल चालमें आते हैं, लिखनेमें कम। नाटक, उपन्यास आदिके कामके हैं, इतिहास आदिके लेखक उन्हें बरताव में नहीं लाते। ___ कुछ इबारत द्विवेदीजीने गोस्वामी राधाचरणजीके मासिकपत्र भारतेन्दुसे पकड़ी है। इसमें एक शब्द आपने ऐसा तलाश किया है कि आपकी तलाशकी प्रशंसा किये बिना रहा नहीं जाता है। गोस्वामीजीके लिखनेसे बढ़कर द्विवेदीजीकी तलाशकी तारीफ है। आपको ऐसी चीजें मिल जाती हैं, यह आपकी कितनी बड़ी योग्यता है ! आप उस शब्दके विषयमें रायजनी करते हैं-“ऊपरके अबतरणमें जो शब्द मोटेसे अक्षरों में छपा है, वह अत्यन्त प्रान्य है। कोई भी (वाह री 'भी' !) सम्पादक किसी सभ्यजनके सामने वैसा शब्द अपने मुंहसे न निकालेगा।" गोस्वामीजीने वैसा शब्द फिर न लिखा होगा और जहांतक हम जानते हैं किसी हिन्दी लेखकने भी उसका अनुसरण नहीं किया। इससे उस प्राम्य शब्द-रत्नके लुप्त होजानेका पूरा भय था। द्विवेदीजीने उसका उद्धार करके एक पन्थका नाम रख लिया। भारतके सब पन्थी मिल- कर उन्हें कोई उपाधि दे झलें तभी इसका बदला हो सकता है। ___ोस्वामीजीकी इबारतमें. है-"अंगरेजी अखबार तो खास इसी वजइसे किये जाते हैं कि वह रियासतके खिलाफ न लिखें-।” द्विवेदीजी

इस वाक्यमें वह' की जगह 'वे' देखना चाहते हैं । आप कहते हैं-"हम

देखते हैं कि लोग वह' शब्दको बहुवचन में भी लिखते हैं और एकवचनमें -भी। यदि अधिक लेखकोंको 'वे' की जगह 'वह' ही लिखना अच्छा लगता हो तो वही सही। इस दशामें व्याकरण बनानेवालोंको चाहिये कि वे 'वह' को एकवचन और वहुवचन दोनोंमें रक्खें।" विपद तो यह है कि द्विवेदीजी न भाषा जानते हैं, न व्याकरण, और [ ४६५ ]