पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४८८

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भाषाकी अनस्थिरता आत्माराम को पिछली बातही ठीक मालूम होती है। क्योंकि अपनी विद्याका इजहार द्विवेदीजी स्वयं क्या करते । सूर्यको यह प्रकाश करनेकी क्या जरूरत है कि मैं सूर्य हूं। उसकी किरणें फैलकर जगतको प्रकाश- मान कर देती हैं। इसी प्रकार यह कई भाषाओंके उदाहरण द्विवेदी रूपी सूर्यको किरणं हैं । आपके उदयकालको पाकर स्वयं आगे दौड़ती हैं। __ खैर, इसका फैसला फिरपर रहे। इस समय आत्मारामको विनय करने दी जाय कि "अनस्थिरता' का द्विवेदीजीके व्याकरणसे क्या फैसला हुआ ? अंगरेजी, संस्कृत और बंगला आदि भाषाओंके जो व्याकरणसम्मत उदाहरण द्विवेदीजीने दिये हैं उनमेंसे बंगलावाला उदाहरण इस प्रकार है- "राखालेर स्त्री मृत्यु शय्याय। डाकर कविराज विदाय लइया छेन ; अवशिष्ट परमायु बड़जोर २-३ घण्टा मात्र । क्रंदनरत आत्मीय खजन मुमुर्षके घिरिया आछेन मुमुर्घ चक्षु उन्मीलित करिया सकलेरदिके चाहिया चाहिया दृष्टि फिराइया लइते छिलेन राखालेर पिता परलोक- यात्रीर मनोभाव बूझिया पुत्रके डाकिया बोलिलेन, 'राखाल आमरा बाहिरे जाइतेछि ; तुमि एइ खाने एकटु थाक ।' सकले बाहिर गेलेन ; राखाल स्त्रीर शियरे बसिल ।” द्विवेदीजीकी रायमें इस उदाहरणमें कर्ता, कर्म, क्रिया, लिंग, बचन और विभक्ति सम्बन्धी कोई दोष नहीं है। तो भी शामतका मारा मुमुर्घ शब्द “जरा विचारणीय" निकल आया। द्विवेदीजी फरमाते हैं-"वह 'मुमूर्षु' क्यों न हो ?” बुद्धिकी बलिहारी! अजी देवता ! जब निर्दोष उदाहरण ही तलाश करना था तो ऐसा तलाश किया होता [ ४७१ ।