पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४९

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गुप्त-निबन्धावली चरित-चर्चा बाबू साहब हमारे बहुत परिचित थे । कलकत्तमें जब आते थे, तो हमारे यहां आनेकी भी कृपा करते थे। उनकी गुणावली वर्णन करनेके लिये आजके लेखमें स्थान नहीं है। ईश्वरसे हमारी प्रार्थना है, कि खड्गविलास प्रेसकी और भी इज्जत बढ़ और बाबू रामदीनमिहजीके पुत्र, पितासे भी अधिक कीर्तिमान हों। --भारतमित्र १९०३ ई. पण्डित गौरोदत्तजी सच्चे नागरी-हितैषी, मच्चे नागरी-प्रचारक मेरठ निवासी पण्डित गौरीदत्तजीका दर्शन हमने दिल्लीके श्रीभारतधर्म महामण्डलके ममारोहमें किया था, उमर माठसे कई माल ऊपर हो गई है। हलके फुलके आदमी हैं। चेहरे पर झुर्रियां पड़ रही हैं। तिसपर भी देवनागरीके लिये व्याख्यान देते ममय इतना जोश था कि लड़कोंकी भांति उछल उछल पड़ते थे। ___ अच्छे गृहस्थ हैं । युवापनमें पण्डिताई, माष्टरी, कमसरियटकी नौकरी आदि सब कर चुके हैं। कुटुम्बी हैं, लड़की-लड़के वाले हैं। गृहस्थका काम अच्छी तरह चला चुके हैं। पुत्र पुत्रियोंके विवाह आदिका खर्च अपनी कमाईसे चला चुके हैं। यह सब करके ४ वर्षकी अवस्थासे देवनागरीके प्रचार में लगे हैं। मेरठसे शहर में नागरीका प्रचार करना काले पत्थरपर पेड़ उगानेसे कम नहीं है। वह उर्दू-फारसीका दास मेरठ शहर, मुसलमानी सभ्यताका चेला मेरठ नगर, जहाँके हिन्दू, नहीं नहीं, ब्राह्मण तक–डाढ़ी रखना पसन्द कर, वल्लह, सुबहान अल्लह, मासाअल्लह और इन्शा अल्लहकी भरमार, जहां दिन रात गजल, शेर , मसनवी यहां तक कि मरासैये अच्छे अच्छे पण्डितोंके मुखपर जारी, ऐसे मेरठ