पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४९२

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भाषाकी अनस्थिरता इस प्रकारकी अटकलपञ्चू बातें लिखकर आप और भी लिखते हैं- “हम यह कह आये हैं कि हम मुहाविरे (गनीमत है कि मुहाविरा न कहा, आपके व्याकरणसे तो वही ठीक होता ) के खिलाफ नहीं । परन्तु जिस तरहकी भाषाके नमूने (अर्थात् भाषाके नमूने) हमने ऊपर दिये (आपकी लियाकतकी बानगी दिख गई, नमने दिये नहीं दिखाये कहिये ।) याद रखिये, (अर्थात् रहे) वे हिन्दीके प्रसिद्ध-प्रसिद्ध लेखकोंके हैं। वे यदि सभी मुहाविरे समझे जायंगे तो, फिर सारा शब्द समूह ही मुहाविरा रूपी (मुहाविरेके साथ रूपीकी क्या गांठ लगी है ! पापोशमें लगाई किरन आफताबकी ! ) किलेके भीतर सुरक्षित हो बैठेगा। (क्या परवा, आप अपने व्याकरणकी तोपसे उस किलेके धुएं उड़ा दीजियेगा।) पर ऐसा होना उचित नहीं। मुहाविरेकी भी सीमा है।” महाराज आप न मुहाविरा जानते हैं और न उसकी सीमा । "भाषाके नमूने मुहाविरे समझे जायंगे” इसका क्या अर्थ हुआ ? आप जरा भाषा, शब्द और “मुहाविरे”का अलग-अलग अर्थ तो पूछ लीजिये। खैर, लिखते-लिखते आपको कुछ मुहाविरेका ध्यान आ गया है। इससे कहते हैं- ____“यह जरूर है कि कुछ मुहाविरे ऐसे हैं (हां कुछ मुहाविरे ऐसे हैं, कहने हीसे काम चल जाता, पर आप इस वाक्यको लम्बा करना ही व्याकरण सम्मत समझते हैं जिनमें कर्ता और कर्म आदि पदोंको स्पष्ट रखनेकी जरूरत नहीं होती। (आप जरूरतकी जगहको खूब पहचानते हैं। हिन्दीके लेखकोंको चाहिये कि हरदम आपको जेबमें रखा करें। जरूरतका मौका पड़नेपर निकालकर आपसे सलाह कर लिया करें।) वे गुप्त रहते हैं। उनके गुप्त रहने ही से वाक्यमें शोभा आती है।" [ ४७५ ]