पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४९३

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना इतनी रुसवाईके बाद आपकी समझमें आया कि कहीं-कहीं कर्ता कर्म आदिके गुप्त रखने हीसे वाक्यमें शोभा आती है। यदि इस विषयके ठीक समझनेका मगज आपको होता, तो राजा शिवप्रसादकी भाषाके एक अत्यन्त सुन्दर टुकड़ेकी आप अपने विचित्र व्याकरणसे गर्दन न नापते। जहां कर्तृ पद “गुप्त रहने ही से वाक्यमें शोभा आती है" उनकी तीन मिसालें द्विवेदीजी देते हैं- __(१) सुनते हैं राजपूतानामें अकाल पड़ा है। (२) दामोदर देर मत करो हमें दफ्तर जाना है। (३) कानपुरसे एक नया अखबार निकला है। चल जाय तो है। इन तीन मिसालोंपर आप यों रायजनी करते हैं- "इन वाक्योंमें "सुनते हैं" "देर मत करो” और “चल जाय” के. कर्तृ पद लुम हैं और उनका अदर्शन कानको खटकता भी नहीं।” 'कानको खकटकता, भी नहीं या कानोंमें खटकता भी नहीं ? व्याकरण और बोलचालसे मिलाकर देखिये । और सुनिये, तीनों वाक्योंमें तीनों कर्तृ पद ही लुप्त नहीं हैं, दूसरे वाक्यमें “दफ्तर जाना है” के बीचसे "को” भी लुप्त है। आप “को” से बड़ा प्रेम रखते हैं, पर यहां उसे भूल गये ! खैर, आपका भी तो व्याकरणकी ओर पूरा ध्यान नहीं रहता! एक विनय और भी है। वह यह कि आपके उदाहरणवाले तीनों वाक्योंमें थोड़ी-थोड़ी मोच है। वह निकाल देनेसे. उनकी शकल यों बन जाती है- (१) सुनते हैं राजपूतानेमें अकाल पड़ा है। (२) दामोदर देर मत करो, दफ्तर जाना है। ( ३.) कानपुरसे एक नया अखबार निकला है। चल जाय तो अच्छा है। [ ४७६ ]