पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४९६

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भाषाकी अनस्थिरता मुकाबिलेमें तब अधिक लिखते हैं। यह भी ठीक समझा जाता है। पर 'जो' के मुकाविलेमें 'तब' लिखना अच्छा नहीं समझा जाता । अच्छे लेखकोंके लखमें यह प्रयोग शायद न मिलेगा। इस जरा-सी वातकं लिये द्विवेदीजोकी घबराहट मुलाहिजा कीजिये- "भापाकी यह अनस्थिरता बहुत ही हानिकारिणी है। क्या ये सभी मुहाविरे हैं और सभी शुद्ध हैं ? यदि ऐसा ही है, तो यह कहना चाहिये कि हिन्दी शब्द-समूहमें बिलक्षण गदर हो रहा है।” । नहीं साहब ! गदर वदर कुछ नहीं हो रहा है, खाली आप घबरा रहे हैं। उर्दूवाले 'जब' 'तब' और 'जो' 'तो' चारोंको शर्तमें लाते हैं । आप पहले दोको समय बाचक बताते हैं और दूसरे दोको शर्तमें लाना चाहते हैं। दोको उर्दूवाले पहले समय और शर्त दोनों में लाते थे अब कम लाने लगे हैं। समयके मौकेपर जबकी जगह जिस वक्त लिखते हैं और 'तब' का व्यवहार बहुधा जबके बिना ही करते हैं । पर द्विवेदोजी चाहते हैं कि हिन्दीवाले उर्दूकी नकलपर न चलें। वह कहते हैं हिन्दीका साहित्य अभी बन रहा है, सर्वमान्य व्याकरण भी कोई अभी तक नहीं बना। इस कारण जो प्रयोग अधिक सयुक्तिक और अधिक सार्थक हों वही क्यों न काममें लाये जायँ ? ___ यह विचार आपका बहुत ठीक है। पर आप तो स्वयं अपने विचारपर पक्के नहीं हैं। आप ही तो भाषाकी अनस्थिरताकी दुहाई देकर अभीसे हिन्दीको टांगोंमें व्याकरणको पछाड़ी बांध देना चाहते हैं । आप हो तो लोगोंको उनकी बोलचालसे हटाकर अपनी व्याकरण-सम्मत बोली सिखाना चाहते हैं। 'जब' और 'जो' के उदाहरणमें द्विवेदीजीने छः वाक्य लिखे हैं, वह इस प्रकार हैं- (१) जब तुम घरपर होगे मैं आऊँगा। (२) जब तुम घरपर होगे तब मैं आऊँगा। [ ४७९ ]