पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४९७

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गुप्त-निबन्धावली बालोचना प्रत्यालोचना (३) जब तुम घरपर होगे तो मैं आऊँगा। (४) जो तुम घरपर होगे मैं आऊँगा। (५) जो तुम घरपर होगे तो मैं आऊँगा। (६) जो तुम घरपर होगे तब मैं आऊँगा। इन उदाहरणों पर द्विवेदीजीकी राय यह है-“इनमें से तीसरे और छठे वाक्यको छोड़कर और कोई वाक्य नहीं खटकता । पहले और चौथे वाक्यमें 'जब' और 'जो' के उत्तरपद लुप्त हैं। इसलिये उनके विचारकी जरूरत नहीं । तीसरे उदाहरणमें समयकी शर्त है और छठे उदाहरणमें घर पर होनेकी। अतएव दोनोंके अर्थ में भेद हुआ। फिर अर्थ भेदके हिसाबसे प्रयोग भेद क्यों न हो ?' ___ द्विवेदीजीको इनमेंसे चाहे जौनसा वाक्य खटके या न खटके 'तो' और 'तब' का व्यवहार वह इन वाक्योंमें भली भांति नहीं दिखा सके। अच्छी भाषा जाननेवाले इनमें से पहले और चौथे वाक्यको अच्छा मानेंगे। और पांचवां भी कुछ लोग बोलते हैं, पर उनका बोलना फसीह नहीं समझा जाता। छठां खाली द्विवेदीजीके मनकी उपज है, इस तरह कोई नहीं लिखता। यदि कोई लिखता हो तो वह कृपा करके उदाहरण दे। अच्छी हिन्दी लिखनेवाले इन छहों वाक्योंमें 'तो' या 'तब' कुछ न लावेंगे और इनमें जितने 'पर' हैं वह भी कतर डालनेके लायक हैं। इन छ मेंसे केवल दो वाक्य इस प्रकार बन सकते हैं,- (१) जब तुम घर पर होगे मैं आऊंगा । (२) जो तुम घर होगे मैं आऊंगा। पहला समय दिखाता है और दूसरा शर्त। अन्तमें विनय है कि अब तो आप 'अनस्थिरता' का कोई ठौर ठिकाना कर दें, क्योंकि आत्माराम अपनी जीट बन्द करना चाहता है। अब वह एकाध बोली और सुनाकर फुर होना चाहता है। उसकी बारी होचुकी । [ ४८० ]