पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५१३

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गुप्त-निबन्धावली भालोचना-प्रत्यालोचन "नैन हमारे लालची तनक न मानत सीख । जहं जहं देखत रूप रस तहं तहं मांगत भीख ।” हुस्नपरस्तीको कवि अपनी कविताका कमाल समझते हैं । हुस्न- परस्ती करना और कवितामें कमाल पैदा करना कवि एक ही समझते हैं। इसीसे जो लोग कविता समझनेकी बुद्धि न रखने पर भी उसमें दखल दरमाकूलात करते हैं, उनके लिये “गालिब” कहता है- हरबुल हवसने हुस्नपरस्ती किया शआर। अब आबरूये शेवये ___ अहले नजर गई।" अर्थ है-हरबुल हवस (जो जिस विषयको नहीं जानता, पर उसमें दूसरोंकी देखादेखी दखल देना चाहता है) अपनेको हुस्नपरस्त कहने लगा, इससे जो सच्ची नजर रखनेवाले हैं, उनके कामकी इज्जत गई । अर्थात् नासमझोंने कवितामें दखल देकर समझदारोंकी इज्जत खोई । हिन्दीमें जिनकी यह समझ है, वह मेक्समूलर और हर्बर्ट स्पेन्सर समझते हैं, यही मजेदारी है। यदि द्विवेदीजी चाहें तो यह बात कविवर "पूर्ण" से समझ सकते हैं। वह आपसे दूर नहीं है। कल्लूके 'आल्हे' और शुक्लकी हाई- कोर्ट की जरूरत न पड़ेगी। आत्माराम [ ४९६ ]