पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५१४

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हिन्दीमें आलोचना "जब तक वर्ष छ महीने वे हरिश्चन्द्र के पूर्वोक्त वाक्योंकी स्थिरताके प्रमाण दे और हमारे इस लेखके एक-एक अक्षरका खण्डन कर तबतक हम हर्बर्ट स्पेन्सरकी एक आध किताबको हिन्दीमें लिखनेकी फिक्र कर।" यह वाक्य श्रीयुक्त पण्डित महाबीरप्रसादजी द्विवेदीके श्रीमुखसे निकल कर गत फरवरी मासकी “सरस्वती' के ७८ और ७६ पृष्ठोंमें प्रकाशित हुए हैं। इनसे जान पड़ता है कि आप हर्बर्ट स्पेन्सरकी किताब समझ सकते हैं और उन्हें हिन्दीमें लिखना चाहते हैं। भगवान करे उनकी यह भली इच्छा जल्द पूरी हो। वह जल्द इस नेक काममें लगे और साधु स्पेन्सरके साधु स्वभावका प्रभाव उनके स्वभाव पर पड़े। क्योंकि हम देखते हैं, जबसे बाबू आत्मारामने आपके नवम्बरकी सरस्वतीवाले "माषा और व्याकरण"के लेखकी आलोचना की है, तबसे आपका मिजाज बहुत अधिक गर्म हो गया है। फरवरीकी सरस्वतीमें उस आलोचनाके उत्तर में आपने जो लेख लिखा है, उससे आपके मिजाज- की वह हरारत विलक्षण रूपसे प्रगट होती है। बहुत रोकने पर भी वह सरस्वतीके २२ पृष्ठोंमें फैल गई है और उक्त पृष्ठ एक-एक तत्ता तवा बन गये हैं। उनपर उंगली रखना कठिन है । अत्यन्त क्रोध या बेहोशीमें मामूली आदमियोंके मुंहसे जैसी बेसिलसिला बात निकला करती हैं, वैसे ही आप जैसे विद्वान् और असाधारण पुरुषके मुखसे निर्गत हुई हैं । इतनी बदहवासी और घबराहटमें आपको स्पेन्सरसे साधु पुरुषकी पोथियोंका किसी तरह ध्यान आ गया है, यह बड़ी शुभ बात है। स्पेन्सरकी जीवनीकी कुछ बातें पढ़नेका एक बार हमें भी सौभाग्य [ ४९७ ।