पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५२२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


हिन्दीमें पालोचना आलोचकोंको दोषी कहना स्वयं दोषी बनना और अपने कामको स्वयं निन्दा करना है। ___ हमारी द्विवेदीजीसे विनय है, कि इस बहसमें वह अपने मुकाबिलको ईर्षा-द्वषके इल्जामसे रहित करं, चाहे उसे अल्पज्ञ समझते रहें। यदि आप इस बहसमें आत्मारामको भारतमित्र-सम्पादक न समझते और उससे अपनी पुरानी शत्रुता न बताते, तो भी उसके लेखका उत्तर देसकते थे। वह उत्तर आपका फरवरीके उत्तरसे अधिक निर्बल न होता और न उससे आपके हृदयको इतनी दुर्बलता और स्वभावकी इतनी असहि- प्णुता प्रगट होती, जितनी फरवरीके उत्तरसे हुई है। आपके फरवरीके उत्तरने साबित कर दिया है कि आलोचनाकी लेखनी उठाना आप जैसे दवल चित्तोंके लिये खाली बिडम्बना है। पराई आलोचना करनेको निकलना ओखलीमें सिर देना है। उसपर कितनीही चोट पड़, सहना होती हैं। एक गंवारी कहावत है कि एक छेड़की तीन सौ साठ गालियां होती हैं। आप छेड़ करना पसंद करते हैं, पर उत्तर सुननेकी हिम्मत नहीं रखते . - - किस प्रकारके आलोचक हैं। यदि किसीके एक चांटा जमानेका शौक रखते हो, तो दस चांटे खानेकी समाई रखो। यह नहीं कि आप तो किसीको मार बैठ और जब स्वयं मार खाई तो रोते- गोटते घर आये ! मां-बापको हैरान किया और मुहल्ले भरको सिरपर उठा लिया ! लीजिये जिस हर्बट स्पेन्सरको आप आदर्श मानते हैं और उसकी एक-आध पुस्तककी हिन्दी करना चाहते हैं, उसीकी बात लीजिये। नवम्बर १८७२ ई०के Contemporary Review में डाकर हजसनने इबर्ट स्पेन्सरके विरुद्ध कुछ आलोचना की थी। उसका उत्तर लिखते हुए वह कहता हैं-"I Value then as coming from a thinker of subtlety und independ ones. (मैं इन विचारोंका आदर