पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५३५

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मुप्त-निवन्धावली बालोचना-प्रत्यालोचना बड़ी कृपा रही और वह इसमें जब तब कुछ न कुछ लिखते रहे, जिसका परिचय हम ऊपर दे चुके हैं। इन ६ महीनोंमें बहुत कुछ लिखा-पढ़ी चली, मेल-ममत्व दिखाया गया, पर बेखटके यह थोड़ा समय भी पार न हुआ। बीचहीमें कई बिघ्न उपस्थित हो गये । २६ जनवरी सन् १६०० ई० के 'भारतमित्र में आपका एक लेख छपा था, जिसका शीर्षक था-'हिन्दी-शिक्षावलीके तृतीय भागकी समालोचनाका परिणाम'। आपने 'हिन्दी-शिक्षावली'के तृतीय भागकी समालोचना छपवाई थी। इस लेखमें आपने उस समालोचनाका परिणाम दिखाया । अपनी आलोचनामें उक्त पुस्तककी भूलें दिखाई थीं, इस परिणाममें उन भूलोंकी पूंछ पकड़कर खेंची गई। शिक्षावलीकी भूलोंका आप यहाँ तक सुधार चाहते थे कि जो चीजें शिक्षावलीके संग्रहकर्ताओंने दूसरी जगहसे संग्रह की थीं, उनका जिम्मेदार भी वह उन्हींको ठहराते थे। 'खिलौना' नामकी एक पोथीसे उक्त शिक्षावलीमें कुछ उद्धृत हुआ था, उसमें भी आपने भूलं दिखा डालीं। आपने लिखा- "खिलौना नामक पुस्तकके कविने एक चरणमें २६ और दूसरेमें २८ मात्रा जड़ दी हैं। देखिये-'टम ढमाढम ब्याह गिलहरीका है सुनिये आज, आसन पोथी लेके चलिये पांडेजी महाराज ।' ढम ढमाढमके पहले 'ढ' को दीर्घ और महाराजके 'हा' को ह्रख करनेसे क्या छन्दकी शोभा क्षीण हो जाती ? हिन्दी शिक्षावलीके रचने, शोधने और प्रकाश करनेवालोंका शुद्धताकी ओर कितना ध्यान है, यह इस पद्यसे विदित है।" ___ यह बात द्विवेदीजीने कितनी नरमी और कितनी मधुरतासे समझाई है, इसकी ओर पाठक ध्यान देंगे। क्योंकि दूसरोंसे द्विवेदीजीके तरफदार बड़े मधुर और शिष्ट बर्तावकी आशा रखा करते हैं । 'खिलौना' लिखने- वालेके मित्रोंमेंसे रामभजराम नामके एक सज्जनने ५ फरवरीके 'भारत- मित्र'में इसपर कुछ अलोचना की, उनके लेखमेंसे हम कुछ पक्तियां उद्धत [ ५१८ ]