पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५३७

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना विचारना चाहिये था कि बनानेवाला निरा मूख ही न होगा। बच्चोंके लिये कविता बनाई है, उसमें एकआध मात्रा टूट जाय, तो कौन बड़ी बात है ? घरको दाई या दादी, नानोके समयकी कोई कहानी, द्विवेदीजीको अवश्य याद होगी-कहांकी बुढ़िया कहांका तू, चल मेरे रहटा चहरक चूं'-को मात्रा गिन तो डालिये और जरा 'तू' और 'चूं' का काफिया भो तो देखिये । आप तो अंगरेजीके पण्डित हैं, बच्चोंकी प्रकृति- को पहचानते हैं, फिर क्या आप नहीं जानते कि खिलौनेवालेने बच्चोंकी तबीयतका खयाल रखकर उनके Rhymes को उनके मिजाजके माफिक रखा है। एक जगह उसी 'खिलौना' पोथीमें आंखके साथ फांकका काफिया बांधा गया, तो क्या 'खिलौना' बनानेवाला इतना मूर्ख है कि उसे क-ख की भी खबर नहीं ? परन्तु जो जरा भी समझके देखेगा, तो समझ जावेगा कि माता बञ्चको गोदमें लिये लोरी दे रही है। किसी कविकी जोर नहीं है, उस बच्चकी माता है। इसीसे अल्ल-बल्ल उसके जोमें आता है, सो कहती है।" ___२६ फरवरीके अङ्कमें “रामभजनको दक्षिणा" लिखकर द्विवेदीजीने उसका उत्तर दिया है। जरा आपके ग्वयालकी दौड़ देखनेके योग्य है -“पटना-निवासी बाबू पत्तनलालकी किताबोंपर हमारा एक लेख कुछ दिन हुए 'भारतमित्र' में प्रकाशित हुआ था। इसीसे चिढ़कर जान पड़ता है, रामभजरामजी गोमुखीको सिरहाने रखकर ५ फरवरीके 'भारतमित्र में 'शिक्षावली'की समालोचनाके विषयमें भवति न भवति करनेको उतारू हुए हैं। रामभजनजीने अपना नाम न देकर छिपेही छिपे 'ओनमोभगवतेवासुदेवाय'का माला फेरा है।" आदिसे द्विवेदीजीकी यह समझ है कि आप जिस किसीके लिये जो चाहें सो लिख, उसका कारण तलाश करनेकी जरूरत नहीं ; पर आपके लिये जब कोई कुछ लिखता है, उसका जरूर एक न एक कारण होता है। इससे रामभजनने [ ५२० ]