पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५४

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मुन्शी देवीप्रसाद चात हुई ! याद करते करते आँसू निकल पड़े ! अब नहीं लिया जाता ! -भारतमित्र १९०७ ई. मुन्शी देवीप्रसाद श्रीयुक्त मुंशी देवीप्रसाद महोदय हिन्दी-भापा और देवनागरीके प्रचारके बड़े पक्षपाती हैं। यद्यपि आप फारमी और उदके विद्वान हैं, नथापि हिन्दीक तरफदार बहुत दिनसे हैं। बहुत दिन पहले हिन्दोमें “राजस्थानका म्वप्न" नामकी पुस्तक लिम्बकर आपने अपने हिन्दी प्रेमका परिचय दिया था और गजम्थानकी रियासनोंमें देवनागरी अक्षरोंके प्रचारके लिये जोर दिया था। मुसलमान बादशाहों और हिन्दू राजाओंका इतिहास जाननेमें आप अद्वितीय पुरुप हैं। गजम्थानकी एक एक रियासतहीकी नहीं, एक एक गांव और एक एक कसबेकी सब प्रकार- को बातोंको आपने इम तरह खोज ग्योजकर निकाला है, कि आपको यदि राजस्थानका मजीव इतिहास कहें ; तो कुछ भी अत्युक्ति नहीं होती। राजस्थानके इतिहासकी खोजमें आपने जैसा श्रम किया है, उससे आपका नाम 'मुवरिखे राजपूताना' पड़ गया है। पर मच पूछिये तो वह राज- स्थानके केवल इतिहाम-लेग्यकही नहीं, वरञ्च वहाँके रोफार्मर या सुधारक भी हैं। बहुतसे देशी रजवाड़ोंमें उनकी लेबनीसे बहुत कुछ सुधार हुआ है। हिन्दीके प्रेमियोंके लिये यह एक बड़ेहपका विषय है कि इस प्रवीणा- वस्थामें वह हिन्दीके मुरब्बी हुए हैं और हिन्दीभाषाके इतिहास-भण्डार- को पूर्ण करनेकी ओर उनका ध्यान हुआ है। ___ मुंशी देवीप्रसादजी गौड़ कायस्थ हैं । आपके पूर्वपुरुप दिल्लीसे भूपाल गये थे। उनमेंसे एक मुंशी नरसिंहदास थे। उनके पुत्र मुंशी आलमचन्द थे, उनके बेटे घासीराम मुंशी देवीप्रसादके परदादा थे ; जो बड़ मुंशी और [ ३७ ]