पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५४३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


गुप्त-निबन्धावली बालोचना-प्रत्यालोचना और यदि अदालत न्याय न कर सके, तो ऐसी कविता छापनेके अनु- पातमें सम्पादक आत्महत्या करले ।” पण्डित गंगाप्रसादजी अग्निहोत्रीने यह न समझकर कि ऊपर लिखी कविताका भाव कैसा खराब हो गया है, अपनी ओरसे इसका यों तर- जमा किया-"सरस्वती-पत्रिकाके सञ्चालक तथा सम्पादक उसको कागज, स्याही, अक्षर, चित्र और गम्भीर भाव-गर्भित लेख आदिसे परि- पूर्ण करनेके लिये कोई बात उठा नहीं रखते हैं. तथापि जबसे उन लोगोंने उक्त पत्रिकाको प्रकाशित करना प्रारम्भ किया है, तबसे उन लोगोंको हानिही उठानी पड़ी।" हमने इसके उत्तरमें लिखा- ___“यदि उस कविताके कविका यही भाव है, तो यही वाक्य ज्योंका त्यों लिख देना उचित था, यदि तुकबन्दी करनी थी तो यों करते- सरस्वतीके जो हैं सम्पादक सञ्चालक । सचे जीसे हैं इसके पक्के प्रतिपालक ॥ देकर कागज-स्याही अक्षर चित्र मनोहर । और लेख गम्भीर भावगर्भित सुन्दर तर ॥ चित्त लगाकर इसको हैं वह खूब चलाते । ___ हाय बिचारे तिस पर भी हैं घाटा पाते।" हमने और लिखा था-"कविने सरस्वतीको बालिका बनाकर विनयके लिये खड़ा किया है। उसके मुखसे वैसेही शब्द निकलना उचित हैं, जो हिन्दु-कुल-कन्याके लिये उचित हैं। कन्या चाहे कङ्गाल हिन्दूकी हो, चाहे भाग्यवानकी, वह रूप और मीठे वाक्योंकी बिक्री नहीं कर सकती। यह काम वेश्याकी लड़कीका है। इससे उक्त कविता भदी ही नहीं है, कविका भद्दापन भी दिखाती है। आंग्ल-भाषाके विद्वत् चूड़ामणियोंसे 'भारतमित्र'का द्वेष नहीं है। भारतमित्रमें अच्छे-अच्छे अंगरेजी पढ़े विद्वानोंकी कविता छपती रहती हैं। [ ५२६ ]