पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५४५

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना झब्बेदार टेढ़ी-टोपी लगाये छड़ी हाथमें लिये, लम्बी जुर्राब और गुरगा- बियां पहने, टांगे लटकाये, मुंहपर हाथ धरे बैठे हैं । यह तसवीर लखनवी भंड़वोंकी तसवीरोंसे मिलती है। आठवीं कुसीपर-एक अकालके मारे भूखे बैसवाड़िया दादासे बैठे हैं। आपकी चोटी लटक रही है, सिरपर एक विलक्षण पगड़ी है। शरीरकी सब हड्डियां गिनी जाती हैं । हाथमें भीख मांगनेकासा लोटा है। यही मालूम होता है कि तीन चार फसल इनकी खराब हो गई, बीज भी वसूल नहीं हुआ तब भीख मांगनेको आ बैठ हैं। यह नाटकको कुर्सीपर बैठ हैं। कोपकी नवीं कुर्सी खाली है। चौथी कुसीकी बात हम छोड़ गये. वह आलोचनाकी है। उसपर एक बन्दर विराजमान है। उसकी खूब लम्बी कलशदार टोपी है। जांघिया और सदरी पहने हुए है, दुम बगलमें दबा रखो है, बाएं हाथमें दर्पण लिये उसमें अपने मुखचन्द्रका दर्शन कर रहा है। उसके पास खड़ी सरस्वती रो रही है। बीणा और पोथी फक रखी है और दोनों हाथ मुंहपर रखे हैं। सरस्वतीकी इस तसवोरपर २५ अप्रैल, १६०३ के 'भारतमित्र' में एक आलोचना हुई । आलोचनाके ऊपर साहित्य-सभाकी आलोचनावाली कुसी नम्बर ४ के बन्दरकी तसवीर है और उसके नीचे यह नोट है- ___ “सरस्वतीकी फरवरी और माचकी संख्या साहित्य-सभावाली तसवीर बहुत बढ़िया बनी है। सभामें । कुर्सियां हैं, उनमें से चौथीपर समालोचना-रूपी महावीरजी विराजमान होकर दर्पणमें अपना मुख- चन्द्र निहार रहे हैं। यह तसवीर बहुत पसंद आई, इसीसे इसका विशद चित्र बनाकर पाठकोंको भेट देते हैं। एक मित्रने चित्र देखकर कहा कि सरस्वतीजी सभामें रोती हैं, वह आप ही का मुंह देखकर । बेचारीने डरसे मुंह छिपा लिया। भारतमित्रकी इस आलोचनामें एक मीठी दिल्लगी है। सरस्वती- [ ५२८ ।