पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५४६

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हिन्दीमें आलोचना सम्पादकने नाटकको भूखा-सूखा बाह्मन बनाया है, पर हिन्दी नाटकोंसे एकदम खाली नहीं है। हरिश्चन्द्र, प्रताप, अम्बिकादत्त, श्रीनिवासदास, लक्ष्मणसिंह, सीताराम और दूसरे सज्जनोंके अनुवादित और रचित नाटक हिन्दीमें बड़े आदरकी वस्तु हैं । काव्य तो हिन्दीमें ऐसा मौजूद है कि दूर-दूर तक इज्जत होती है। व्याकरण भी हिन्दीमें बुरे नहीं हैं। उपन्यासोंकी अभी बेशक कमी है। पर द्विवेदीजीने कृपापूर्वक सबको एकही लाठी हांका है। पर समा- लोचनाका बन्दर जो आईनेमें अपना चन्द्रानन आप देख रहा है, न जाने द्विवेदोजीने क्या समझकर बनाया। हिन्दीमें समालोचक तो वह स्वयं ही हैं। समालोचनाकी उन्होंने पोथियां तक लिखडाली हैं। फिर आपका नाम भी महावीर है, इससे समालोचनाकी कुसी पर वह स्वयं बैठे हुए आईनेमें अपना मुंह देख रहे हैं और सरस्वती उनकी यह अद्भुत लीला देखकर रो रही है ! द्विवेदीजी दूसरोंको बनाने चले थे, पर स्वय बन गये । यही भारतमित्रने उनको समझाया ! ___ अब द्विवेदीजी स्वयं न्याय करें कि उनकी कविताका एक दोष दिखाना और एक ऐसो दिल्लगीमेंसे जो उनकी ओरसे सब हिन्दीवालोंके साथ बड़ी बेदर्दीसे की गई है, उन्होंकी दिल्लगी निकाल देना क्या शत्रुता करना है ? आप सारे जमानेको छेड़ने निकले हैं, ऐसी दशामें कोई आपको छेड़ बैठे तो उससे आप नाराज क्यों हों ? ___आत्मारामकी आलोचना । पिछले लेखोंमें हम यह दिखा चुके हैं कि कभी लेख, कभी नोट, कभी तसवीर आदिके रूपमें हमने अपनी क्या नेकनीयती बाहर निकाली । इस सम्बन्धकी जितनी जरूरी बातें थीं, उनका सार हम दिखा चुके । और भी दो-चार बातें तलाश करनेसे निकल सकती हैं, पर [ ५२९ ]