पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५५०

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हिन्दीमें आलोचना घरों' में कैसे रखी जा सकती हैं। 'ठठरी' एक वचन 'अजायब घरों' बहुवचन ! उसी वाक्यमें आगे चलकर आप स्वयं 'ठठरियों' लिखते हैं। जब एकही 'ठठरी' रखी थी तो 'ठठरियों का ढेर कहांसे निकाल लिया ? 'ठठरियों' बहुवचन है। व्याकरण यह बता सकता है कि 'ठठरी' एक वचन है और 'ठठरियों' बहुवचन, पर वह किसीको कहीं 'ठठरी' और कहीं 'ठठरियों' लिखनेसे रोक नहीं सकता। जो लोग इस प्रकारकी भूलोंमें पड़ते हैं, व्याकरण उनका कहां तक सुधार कर सकता है ? द्विवेदीजीहीको लीजिये। भाषा और व्याकरणवाल लेखमें उनका एक वाक्य था-"इस तरहकी सारी त्रुटियोंको हम मुहाविरा नहीं समझते ।” यह वाक्य एकदम गलत है। जो हिन्दी जानते हैं, वह इसकी बनावट पर हँसे बिना कभी नहीं रह सकते। पर द्विवेदीजी इसे बड़ा शुद्ध समझते हैं और इसकी शुद्धताका पक्ष करते हुए फरवरीकी 'सरस्वती'में बेतरह बिगड़े हैं। यह वाक्य इस तरह होना चाहिये था- "इस तरहकी त्रुटियां हम मुहावरेमें नहीं गिन सकते ।” अथवा “इस तरहकी त्रुटियोंको हम मुहावरेमें नहीं गिन सकते ।” पर द्विवेदीजी लिखते हैं-"टियोंको हम मुहाविरा नहीं समझते।" यह वाक्य उनका मुहावरेके खिलाफ है। ऐसी बोलचाल नहीं है। व्याकरणमें शक्ति नहीं है, जो भाषाके जोड़तोड़की इस प्रकारको भूलों को बता सके । द्विवेदीजीके इस वाक्यमें “सारी" शब्द फालतू देखकर आत्मारामने नोट किया-“बल्कि लहंगा।” इसका मतलब यह था कि त्रुटियों के पहले 'सारी' शब्दका जोड़ना फजूल है। द्विवेदीजीने उसके समझनेकी चेष्टा नहीं की। आपने समझा कि “सारी” शब्दहीको आत्माराम गंवारी समझता है, इसीसे आत्मारामके लेखमेंसे एक “सारी” निकालकर लाये ओर उसपर 'लहंगा' 'घाघरा' 'धोबिन' आदि कितनेही शब्द बिठाये। । ५३३ ]