पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५६६

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अश्रुमती नाटक लड़कीके मुसलमानों द्वारा चुराये जानेकी बात कहीं नहीं कही है। मुसलमानी इतिहासोंको पढ़कर हमने पता लगाया है कि हल्दीघाटकी लड़ाईके समय शाहजादे सलीमकी उमर कुल सात बरस थी। इतने छोटे सलीमके साथ किसका प्रेम हो सकता है ? और वह छोटा-सा बचा सलीम किससे प्रेम कर सकता था ? पर धन्य ग्रन्थकार आपकी लेखनीने एक बेतुका प्रेमका फौव्वारा छोड़ ही दिया ! निष्कलकोंपर कलङ्क जो लोग हिन्दुओंकी दृष्टिमें पापरहित, निष्कलङ्क और महात्मा हैं, वही इस 'अश्रुमती' नाटकमें अधिक कलंकित किये गये हैं। जिस प्रतापको मुसलमान नरेशोंसे घोर घृणा थी, उसीकी लड़कीको इसमें मुसलमानके प्रेममें कलंकित किया गया है। जिस पृथ्वीराजने मोहमें आये प्रतापको अपनी उत्तेजनामयी कवितासे मोह-भङ्ग किया था, उसीको इस पुस्तकमें पामर-से-पामर करके दिखाया है। वह पहले तो एक स्त्रीसे प्रेम करके उसे विवाहकी आशा देता है। फिर उससे प्रेम तोड़कर 'अश्रुमती' के प्रेममें फँसता और सलीमके हाथसे मारा जाता है। किन्तु यह सब मिथ्या है। पृथ्वीराज सूर्यकी तरह निष्कलङ्क था। वह खाली कवि और वीर ही न था, वरञ्च इस संसार और इस संसारके प्रेमको तुच्छसे भी तुच्छ समझता था। भक्त शिरोमणि नाभाजीने अपनी भक्तमालके १०८ भक्तोंकी लड़ीमें उसको भी पिरोया है। वह यों लिखते हैं :- "सवैया गीत श्लोक वेलि दोहा गुन नवरस । पिंगल काव्य प्रमाण विविध विधि गायो हरिजस ।। परि दुख विदुख सलाध्य वचन रसनाजु विचार। अर्थ विचित्रनि मोल सबै सागर उद्धार ।