पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५७८

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बङ्गला साहित्य पर पुस्तकपर न असली ग्रन्थकारका कहीं नाम है और न अनुमतिका जिक्र। ___ जो बाबू प्रियनाथ मुकर्जी एक नामी डिटेक्टिव अफसर हैं और जिनके 'दारोगादफ्तर के अनुवादका 'प्रवासी' दूसरोंपर इलजाम लगाता है, उन्हीं- की एक बात सुनिये। आपने अंगरेजीके शरलाकहोमके लेबसे “कृप- णेर धन” और “प्रणये संशय” नाम देकर 'दारोगादफ्तर' में छाप लिया है। न असल किताबका नाम दिया है, न निशान दिखाया है। ठीक यही जान पड़ता है कि सब प्रिय बाबूकी करामात है । “मिस्ट्रीज आफ पेरिस” को “ठाकुर बाड़ीरदफ्तर' नाम देकर 'बसुमती' वालोंने प्रकाश किया। न मूल लेखकका नाम है और न किसीकी अनुमति ली गई है। उपेन्द्रनाथ मुखर्जीने अमेरिकन डिटफ्टिवसे "मारकिन गोइन्दा” और फ्रच डिटेकिवसे “फरासी गोइन्दा” बसुमती आफिससे छापकर निकाला है, कहीं नाम नहीं कि असली ग्रन्थकार कौन है। भुवनचन्द्र बनर्जीने अमेरिकन डिटेकिवको पुस्तकोंको 'पुलिस कमिश्नर' मासिक पत्रके नामसे छाप डाला ; मगर कहीं मूल लेखकका नाम नहीं दिया। ___ यह दो चार मोटी-मोटी बात कही गई हैं। थोड़ा ध्यान देनेसे बहुत बात मालूम हो सकती हैं और हमें भरोसा होता है कि और बहुतसी बातें मालूम होंगी। पर इन सब बातोंके लिखनेसे हमारा यह मतलब नहीं है कि हिन्दीवाले बंगला किताबोंका तरजमा किया कर और असली ग्रन्थकर्ताओंका नामोनिशान न दिया करें और न उनसे तरजमा करनेकी अनुमति लिया कर। वरञ्च हम यही दिखाना चाहते हैं कि जो दोष हिन्दी अनुवादकर्ताओंमें आगये हैं, वह बंगला लेखकोंमें भी हैं। आशा है कि 'प्रवासी' उस ओर भी ध्यान देगा। ___-भारतमित्र सन् १६०३ ई०