पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५९१

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना मोर शेरअली अफसोस भी इसी मण्डलीमें थे। दिल्ली-निवासो थे। ११ वर्षकी अवस्थामें अपने पिताके साथ लखनऊ आये। गिल- काइस्ट साहबने कई एक अच्छी उर्दू जाननेवाले लखनऊसे बुलाये थे। लखनऊके रेजीडेण्ट स्काट साहबने शेर अलीको चुना, दो सौ रुपये महीने तनखाह नियत करके, ५०० रु० मागके व्ययके लिये देकर कलकत्ते भेजा। वह सन् १८०० ईस्वीमें कलकत्ते पहुंचे और ह वर्ष पीछे मर गये। इन्होंने “आराइशे महफिल' नामकी एक आदरके योग्य पुस्तक लिखी थी। इसमें हिन्दुस्थानको बहुत-सी बातें लिखी थी, यह सुजान- रायकी पुस्तक 'खुलासतु तवारीख'से बनाई गई थी। मरनेसे एक वर्ष पहले सन् १८०८ ईस्वोमें इन्होंने सादोको गुलिम्तांका उर्दू अनुवाद 'बागे उर्दू के नामसे किया। नेहालचन्द्रने सन १८०४ ई० में गुलेबकावली गद्य उर्दूमें लिखी और उसका नाम 'मजहबेइश्क' रखा। कासिमअली जवान दिल्लीके थे। लखनऊ गये और वहांसे सन् १८०० ईस्वीमें कलकत्तेके फोर्ट विलियम कालिजमें आये। उन्होंने सन् १८०२ ईस्वीमें शकुन्तलाको कहानी उर्दमें लिखी। नवाज कविने ब्रजभाषामें सन् १७१६ ईस्वीमें शकुन्तलाकी कहानी लिखी थी। उसीका यह अनुवाद है। उन्होंने एक बारहमासा लिखा था। उसमें हिन्दू मुसलमानोंके तेहवारोंका वर्णन है। उसका नाम 'दस्तूरे हिन्द' रखा और वह सन् १८१२ ईस्वीमें छपा। इकरामअलीने एक अरबी पुस्तकसे उर्दूमें 'इखवानुस्सफा' नामकी एक पुस्तक सन् १८१० ईस्वीमें लिखी। इसमें आदमी और जानवरोंका झगड़ा, जिनोंके बादशाहके सामने फैसला कराया है। श्री लल्लूलालजी गुजराती ब्राह्मण थे, उत्तर भारतमें आकर बस गये थे। उन्होंने फोर्ट विलियम कालिजके निरीक्षणमें हिन्दीकी कई पुस्तके [ ५७४ ]