पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५९४

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।। श्रीः ।। स्फुट-कविता देव-देवी स्तुति जय रामचन्द्र (१) जयति जयति जय रामचन्द्र रघुवंश-विभूषन । भक्तन हित अवतार धरन नाशन भव-दृषन ।। जयति भानुकुल भानु कोटि ब्रह्माण्ड प्रकाशन । जयति जयति, अज्ञान-मोह-निशि-तिमिर विनाशन ।। जय निज लीला-वश वपु धरन, करन जगत कल्यानमय ।। जय कर-धनुशर तूनीर-कटि, सिया सहित श्रीराम जय ।। शिव विरश्चि अहिराज पार कोऊ नहिं पावें । सनकादिक शुक नारद शारद ध्यान लगावें ।। मुनिगन जोग समाधि करहिं बहुविधि जा कारन । तदपि रूप वह सकहिं न करि उर अन्तर धारन ।। सो अखिल ब्रह्म शिशुरूप धरि, खेलत दशरथके सदन । [ ५७७ ] ३७