पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६००

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देव-देवी स्तुति और कहा चाहो सुन्यो त्राहि त्राहि प्रभु त्राहि ।। जिनको अस व्यवहार प्रभु जिनकी ऐसी चाल । तिनको तपबल आप तुम बूझो दीनदयाल ।। तहां टिक क्यों बाहुबल जिन घर मेवा फूट । बल बपुरो कैसे रहे जाय बाहु जब टूट ।। जहाँ लरे सुत बाप संग और भ्रातसों भ्रात । तिनके मस्तकसों हटै कैसे परकी लात ।। लरि लरि अपनो बाहुबल खोयो कृपानिधान । आप मिटै तौह नहीं मिटी लरनकी बान ।। अझ जो पूछौ दाम बल पल्लै नाहिं छदाम । 4 दामहुके फेर महं भूले तुम्हारौ नाम ।। निस दिन डोलन दाम लगि कूकुर काक समान । जन्म बितावत प्रेत जिमि कृपासिंधु भगवान ।। हमरे जीवनमांह प्रभु अब सुखको नहिं लेस। लेब भालको बन रहे चिन्ता दुःख कलेस ।। चितवत जागत स्वप्न महं चिन्ता रहत अपार । कब लों ऐसन बीति है नाथ दया आगार ।। धर्म न अर्थ न कामके नाहिं रामसों प्यार । ऐसे जीवन पोचकहं बार-बार धिक्कार ।। नाहिन पार बसात कछु बुद्धि करत नहिं काम । सूझत नाहिं सुपन्थ प्रभु दया करो श्रीराम ।। राम! आप बिन को गहे परे गिरे को हाथ ? नाथ अनाथनके सदा तुमहीं हो रघुनाथ ।। बूड़त हैं भवसिंधुमहं बेगि उबारो राम । नाथ आपसो दुसरो नाहिं हितू निसकाम ।। [ ५८३ ]