पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६०४

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देव-देवी स्तुति केहि कारण पावत नहीं आधे पेटहु नाज । कौन पापसों वसन बिन ढकन न पावहिं लाज ।। सीत सतावत सोत महं अरु ग्रोसम महं घाम । भीजतही पावस कटन कौन पापमों राम ? केने बालक दृधके बिना अन्नके कौर । रोय रोय जी देत हैं कहा सुनाव और ।। कौन पापत नाथ यह जनमत हम घर आय । दृध गयो ५ अन्नह मिलत न तिनकहं हाय ।। केते बालक डोलते माता पिता बिहोन। एक कौरके फेर महं घर घर आगे दीन ।। मरी मातकी देहकों गीध रहे बहु खाय । ताहीसों यक दूधको सिसू रह्यो लपटाय । जहं नहं नर कङ्कालके लागे दीखत ढेर । नरन पसुनके हाइसों भूमि छई चहुं फेर ।। हरे राम केहि पापते भारत भूमि मझार । हाड़नकी चक्की चलें हाडनको व्यापार ।। अब या सुखमय भूमि महं नाहीं सुखको लेस । हाड़ चाम पूरित भयो अन्न दुधको देस ।। बार बार मारी परत बारहिं बार अकाल । काल फिरत नित सीस पै खोले गाल कराल ।। यह दुर्गति नर देहकी कौन पापते राम । साच कहो क्या होइ है अब हमरो परिनाम ।। बार बार जियमें उठत अब तो यहै विचार । ऐसे जीवन ख्वार 4 लाख लाख धिक्कार ।। फिरत पेटके फेर महं सूकर स्वान समान [ ५८७ ]