पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६०८

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देव-देवी स्तुति दीन मलीन न मोपे कछू निधि ताहू 4 हों विधिसों अज्ञानी । डोलत तो पद पंकजसों च्युत देहधरे नित आलस-सानी । मेरे सबै अपराध छमौ अहो लोकउधारिनी मात भवानी । पूत कपूत कढै कबहूं पर मात कुमात नहीं जग जानी ।। केतहु पूत तिहारे अहैं वसुधापं अरी बहुधा बहु ज्ञानी । हो तिनमें अरो केवल एक फिरूं खल चञ्चलताईकी खानी । याहीके हेत बिडारिबी दीनको जोग नहीं तोहिको कल्यानी। पृत कपूत कहें कबहूं पर मात कुमात नहीं जग जानी । (४) हे जगदम्ब न पायनमें तुम्हरे में धरी कबहुं मन बानी । नाहिन मात कभी बहु द्रव्य पदारथ ले कछु भेट है आनी । तापर नेह तुम्हारो अनूपम देखतहो मन निश्चय जानी । पूत कपूत कढं कबहू पर मात कुमात नहीं जग जानी ।। देव तजे सबरे, विधि-संजत पूजन सेवनसों अकुलाई । बीत गई बिडरात अहो मम आयु पचासीहुसों अधिकाई ।। देवि दया करिक अब जो लइहो नहिं दासहुको अपनाई । तो गणनायक-मात बिना अवलम्ब रहों किहिके ढिग जाई ? स्वापचहू चरवाक बनै जननी मधुबोल उचारन वारो। रंक बिहाय अतंक सबै सो फिरै निधि कोटिनमें मतवारो ।। ताको प्रतच्छ प्रभाव अहै जो परै श्रुतिमें इक मन्त्र तिहारो। जाप करै विधिसों तुम्हरो नहिं जान सके फलको तिहि सारो।। .९१