पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६१०

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शारदीय पूजा (१) सिंहासन तज धीर पदहिं कन्यालय आवत ! उप्रभाव तजि भानु मृदुल किरनन छिटकावत । जाके तेज प्रचण्ड विश्वको सिर भिन्नायो । तन भये भाठीरूप प्राण तिनमहं बौरायो !! मो तेज प्रताप दिनेसको, मृदुल भयो आई सरत। निज विमल मधुर सौन्दर्यमों, कियो आय भूपित जगत।। कटे जलद जञ्जाल घननको घट्यो घोरतम । मिट्यो वायुको बेग, हट्यो सब माटी करदम ।। सुखद सुहावनि राति नील-निर्मल नभ मण्डल । शोभा अमित अपार करत तारागण झलमल ।। जल सूख्यो धरनि विधौत भई, घाट बाट निर्मल भये। नानाविध तर पल्लव लता, पत्रन पुष्पनसों छये ।। रजत तटनसंग रजत-तटिनि अति शोभा पावत। है प्रफुल्ल ससि रजत-किरण तापर बिथुरावत ।। विमल सोत प्रतिविम्ब नील नभको हिय धारत । करि कौसल ससि तारागन भुंइ-माहं उतारत ।।