पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६१६

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देव-देवी स्तुति अभय दान अब देहु, हमैं निर्भय करो। होंठन पर हैं प्रान, देह पंजर भयो । बेगि जियावहु आय, मान करुनामयी । दया दीठि करि एकबार मा हेरि । तव बिन और न केऊ हे मां मेरि ।। दुखसरिता रहि बाढ़ि कि अम्बु अथाह है। पड़ी भंवरमहं नाव कहूं, न निबाह है ।। अब बिलम्ब केहि काज, अम्ब करुनामयी। बेगि उबारो आय, नाहिं सगरी गयी । मात तोहि बड़ सरन गहेकी लाज । सरन गहेहूं दुख पावहु केहि काज ।। जननि हियेकी पीर जात, नाहिन सही। बेगि निवारो मात दही, काया दही । पाषानी । क्यों हीय कियो, पाषान री। पाषानहि तव नाम खुदैगो जान री ।। (८) का दै जननी पूजा करें तुम्हार । पेटहुकै निस दिनहै हाहाकार ।। उदर भरनहित अन्न रह्यो घरमाहं जो। दानव-दल मा आय काढ़, मुखतें लयो॥ भेंट धरै जो माय कहा, हम पास है । केवल आंखिन जल अरु, लम्बी सांस है ।। [ ५९९ ]