पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६२५

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गुप्त-निषन्धावली स्फुट-कविता 4 वह देखो मा बरसत घोर अंगार । बननाद सम हो रह्यो हाहाकार । वह देखो मा हाड़ मांस नर मुण्ड । धड़ घोड़नके अरु हाथिनके सुण्ड ।। (१२) वह देखी हिलमिल सब भूत पिशाच । कृदहिं खेलहिं हंसहिं दिखावहिं नाच । वह देवो कैसी दीपावलि होति। पोली लाल हरि बहुरंगी जोति । बढ़त घटत बुझ जात दिखावत खेल। घेर बांधके नाचहि ह यकमेल ।। धावहु धावहु बेगि बचावहु माय । बेगि निवारहु अब नहिं देख्यो जाय । हिय मसानमहं बिछि रह्यो, मा आसन तेरो। तब पूजाको चाव है, मन माहिं घनेरो। ऐसो आमन छाड़िके, मत जाबहु माई। करन चहत मा आज हम तेरी पहुनाई ॥ चरबी लोहूसों सन्यों नरमुण्ड मंगायो। चोखे खप्पर देखिके सद रक्त भरायो। खाल आंत बहुभांति अरु हाडनकी ढेरी। मूंड लाय माला करी एकत्र घनेरी । रक्तफूल, सिन्दूर अरु चन्दन री ! माई । लाल वस्त्र पट धूप लै रक्त बनाई । ! ६०८ ]