पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६३२

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देव-देवी स्तुति रही मात तव दया विना सब विद्या छूछी बहुत पसारे हात बात काहू नहिं पूछी। नहिं जननी विद्या बुद्धिको, तव बिन नैक उठाव है। धिक जीवन तव करुना बिना, तोसों कहा दुराव है ? जप तप तीरथ होम यज्ञ तव बिन कछु नाहीं स्वारथ परमारथ सबरो तेरेही माहीं । चले न घरको काज न पितृन अरु देवनको । जनम लेत तव कृपा बिना नर दुख सेवनको । जय जयति अखिल ब्रह्माण्डके, जीवनकी आधार जो। जय जयति लच्छमी जगतकी, एकमात्र सुखसार जो । (७) भलो कियो री मात आय कीन्हों पुनि फेरो तुम्हरे आये हमरे घरको मिट्या अंधेरो। तुम्हरे कारन आज मात दीपावलि बारी घर लीप्यो टूटी फूटी सब वस्तु संवारी । तुम्हरे आये तव सुतनको, आज अनन्द अपार है। सब फूले फूले फिरत हैं, तनकी नाहिं सम्हार है॥ [ ६१५ ]