पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६३३

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मुत-नियमावली स्फुट-कविता - मात आपने कंगालनकी दशा निहारो जिनके आंसुन भीज रह्यो तव आंचल सारो । कोटिन पै रही उड़त पताका मा जिनके घर सो कौड़ी कौडीको हाथ पसारत दर दर । हा। तो-सी जननी पाय के कंगाल नाम हमरो पस्यो। धिक धिक जीवन मा लच्छमी अब हम चाहत हैं मस्यो । (६) तन सूख्यो मन मस्यो प्रान चिन्ता लगि छीजै छन छन बढ़त कलेस कहो कैसे कर जीजै ? जरत अन्न बिन पेट देह बिन वस्त्र उघारी भूग्व प्याससों व्याकुल है रोवत नर नारी। जननी कब करुनकटाच्छसों, इनकी ओर निहारि हो। चहुं ओर दुःख दावा जग, कर गहि आय निकारिहो। (१०) गज रथ तुरग बिहीन भये ताको डर नाहीं। चंवर छत्रको चाव नाहिं हमरे उर माहीं सिंहासन अरु राजपाटको नाहिं उरहनो। ना हम चाहत अस्त्र वस्त्र सुन्दर पट गहनो पैहाथ जोरि हम आज यह, रोय रोय विनती करें। या भूखे पापी पेट कह, मात कहो कैसे भरें ? -हिन्दी-बावासी, २ नवम्बर १८९६ ई. [ ६१६ ]