पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६३५

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गुप्त-निबन्धावली स्फुट-कविता % 3D तौलों ठहरत रूप गुन, जौलौं है तेरी दया। कुल सील आदि है व्यर्थ सब, मात बिना तेरी मया ॥ पुण्यपुञ्ज सो लोग बसहु मा तुम जाके घर । कहा राव कहा रङ्क करैं सब तिनको आदर ।। तव प्रसाद गुणहीन होहिं गुणवान धुरन्धर । रूपशील कुलहीन बनें बहुगुनके आकर ।। कुलरूप शील विद्या तुमहिं, तुम जग सरबस सार हो। अहो मात कृपा तेरी बिना, कबहु न बेरो पार हो । सुर बिरश्चि सुरपति कुबेर सब तोकहं ध्यावें । श्रोपति भूपति नृपति सदा तुम्हरे गुण गावे ।। आरत दीन मलीन हाय ! तुव सुत बिडरावहिं । हा मा! तेरे पूत पेट भर अन्न न पावहिं ।। अब दया करहु फेरो दिवस, पाहि मात बहु अति भयी । मा वेगि उबारौ आयकै, त्राहि त्राहि करुणामयी। सिर ऊपरसों फिस्यो दुसह दारिदको पानी । कौर हेत तव पूत दीन है बोलहिं बानी ।। [ ६१८ ]