पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६४०

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जातीय राष्ट्रिय-भावना हमने माना किसी व्यक्तिको ध्यान न हो परमारथका, पर है यह क्या बात कि चेला ही बन जावे स्वारथका ? हे बाबा महमूद गजनवी लूट-लूट धन जोड़ गया, अन्तकाल उसका जब आया रोते-रोते छोड़ गया। दीन हीन दुखिया लोगोंको मार-मार उसने लूटा, चलती बेर देख धन, अपना मार दुहत्थड़ सिर कूटा। कुछ भी ले जा सका सङ्ग नहिं मलता खाली हाथ गया, सदा सदाको कलङ्क औ पापांका गट्ठड़ साथ गया। करके द्रोह दीन दुखिया लोगोंसे क्या पद पाओगे, अपना नाम बड़ा कर लोगे देशका नाम मिटाओगे। कारूं और शद्दादके झगड़े अब इस समय कहानी हैं, पर कलङ्क औ अपयशकी तो चिरस्थायिनी बानी हैं। वह दिन गये वक्तता देते आंसू टप टप गिरते थे, नेन तुम्हारे दीन हीन लोगोंसे कभी न फिरते थे। अहा! चाटुकारीको खोके चाटुकार तुम बनते हो, अपने हाथ स्वतन्त्रालयको रचके आप ही खनते हो ! स्मरण हमें इस अवसर पै शादीका कहना आता है, ज्यों ज्यों नर बूढ़ा होता है लोभ अधिक हो जाता है । हे धनियो ! क्या दीनजनोंकी नहिं सुनते हो हाहाकार ? जिसका मरे पड़ोसी भूखा उसके भोजनको धिक्कार ! भूखोंकी सुध उसके जीमें कहिये किस पथसे आवे, जिसका पेट मिष्ट भोजनसे ठीक नाक तक भर जावे। हे हे पेट भरो! यूसुफ (३) भूखे अकालमें रहते थे, ( ३ ) मुसलमानोंके एक पैगम्बर थे, जिनके समयमें निश्रदेशमें बड़ा भारी अकाल पड़ा था। [ ६२३ ]