पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६४९

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गुप्त-निबन्धावली स्फुट-कविता तुम वह सब मिट जाओगे दो झोंके ऐसे आवगे, जिनको यहां बिताना हैं वह अपना काल बितावंगे। फिर किस मतलबको यह कौमी नमकहरामी करते हो, व्यर्थ किसी सङ्कीर्ण हृदयकी हाय गुलामी करते हो ? स्वारथ निस्सन्देह तुम्हारा कुछ इसमें अटका होगा, किन्तु जातिकी गरदन पर कैसा भारी झटका होगा। थोड़े दिनके लिये अधिक मत रखिये अपने सुखसे काम, प्रजा भूखसे मरती है कुछ उसका भी सोचो परिणाम । बड़ी बात क्या जो तुमने सिरको दो बार (६) बचाया है, दस सिर रखने वालेको भी अन्तकालने खाया है। परन्तु हाहा इस सिरमें अब इन बातोंको ठौर नहीं, यत्न किये चिकने बर्तन पर ठहर सकी है बून्द कहीं ! परन्तु क्या कीजे जीमें यह बार बार दुख होता है, हाय हमारा वह बूढ़ा यूं पाकर नाम डबोता है। कभी कभी जो ध्यान सिमटकर इन बातोंसे लडता है, बहुत सोच साचके अन्तमें ऐसा कहना पड़ता है। बहुत जो चुके बूढ़ बावा चलिये मौत बुलाती है, छोड़ सोच मौतसे मिलो जो सबका सोच मिटाती है। -हिन्दोस्थान, ६, २९ अप्रेल और २७ मई सन् १८९० ई० (६) कम पढ़े लोगांमें एक बात प्रसिद्ध थी कि सर सैयदका सिर दो बार बिक चुका है। पर जितना समय नियत हुआ था, उसमें उनका देहान्त न हुभा । इससे दोनों पारके रुपये हजम होगये। [ ६३२ ]