पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६५६

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जातीय-राष्ट्रिय-भावना आती है चांदनी ध्यानमें जब फागनकी अति चञ्चल हो जाती है गति मेरे मनकी । कौन दृश्य इन आंखोंके आगे फिरता है कौन इन्हें आकर घण्टों निश्चल करता है। पलक नहीं झपती रह जाती है पथराके कौन इन्हें यं रखता है पहरों बिलमाके । हे हे दुखियो डूबी हो किस दुखसागरमें अब उन बूंदों भेट कहां है भारतभरमें ! शोक ग्रसित क्यों हुई नहीं क्यों पलक उठाती क्या खोया जिसको ढूंढ़से भी नहिं पाती ? ढलक बून्द एक आंसूकी जब मुंह पर आई छटा चाँदनीकी पत्तों पर दी दिखलाई । चौंक पड़ी एकबार शब्द झांझोंका सुनकर पलक उठी तो हाय रह गया सिरको धुनकर । कब तक धोका धरूं बता हे प्यारी आशा कब तक देखे जाऊं यह सुख रहित तमाशा ? कहां झांझका शब्द कहांपर डफ मृदङ्ग हैं कहाँ वह सब लीला और उसका रङ्गढङ्ग है। वह सुखअवसर और अलौकिक सुन्दरताई एक चिन्ह भी उसका नहिं देता दिखलाई । पतितपावनी पूजनीय यमुनाकी धारा सदा पापियोंका जो करती थी निस्तारा । अपनी ठौर आज तक वह बहती है निरमल [ ६३९ ]