पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६५९

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पंजाबमें लायल्टी। सबके सब पंजाबी अब हैं लायल्टीमें चकनाचूर, माराही पंजाब देश बन जानेको है लायलपूर । लायल हैं सब सिक्ख अरोड़े खत्री भी सव लायल हैं, मेढ़ रहनिये बनिये धनिये लायल्टीके कायल हैं। धर्म-समाजी पक्क लायल, लायल है अखबारे आम, दयानंदियोंका तो है लायल्टी सेही काम तमाम । लायल लाला हंसराज हैं लायल लाला रोशनलाल, लायल्टी ही जिनका सुर है लायल्टी ही जिनकी ताल । पोथी लेकर इन्हें पड़ी, अपनी लायल्टी दिखलाना, लाट इबटसन दगे उनको लायल्टीका परवाना। मुसलमान साहब तो इससे कभी नहीं थे छटीमें । पैदा होते ही पीते हैं वह लायल्टी घुट्टीमें । 'वतन' सदासे लायल ही था और अब है 'पैसा अखबार' लायल्टीके मारे ही हैं वह अब जीनेसे बेजार । लायल सब वकील बारिस्टर जमींदार और लाला हैं, म्युनिसिपाल्टी वाले तो लायल्टीका परनाला हैं । खान-बहादुर राय-बहादुर कितने ही सरदार नवाब, सब मिल जुलकर लूट रहे हैं, लायल्टीका खूब सवाब । ऐरा गैरा नत्थू खैरा सबपर इसकी मस्ती है, लायल्टी लाहोरमें अब भूसेसे भी कुछ सस्ती है। केवल दो डिस लायल थे वो एक लाजपत, एक अजीत, दोनों गये निकाले उनसे नहीं किसीको है कुछ प्रीत । [ ६४२ ]