पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६६०

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जातीय-राष्ट्रिय-भावना हाँ, कुछ डिसलायल थे रावलपिंडीके पंडित लाले, वह सब पकड़, दिये फाटकमें बाहर लगा दिये ताले। फिर एक और मिला था डिसलायलका बच्चा पिंडी दाम, मोते उसे उठाकर घरसे फाटकमें करवाया वाम । और दिखाई दिया एक डिसलायल लाला दीनानाथ, उसको भी एक जुर्म लगाकर पिण्डीके करवाया माथ । इन सबसे लाला लोगोंका कुछ भी नहीं इलाका है, लायल लोगोंके धरमें डिस-लायल्टीका फाका है । पेट बन गये हैं इन सबके लायल्टीके गुब्बारे, चला नहीं जाता है, थककर हाँप रहे हैं बेचारे । बहुत फल जानेसे डर है फट न पडं यह इनके पेट, इसी पेटके लिये लगी है लायल्टीकी इन्हें चपेट । सुनते हैं पंजाब देश सीधा सुरपुरको जावेगा, डिस लायल भारतमें रहकर इजत नहीं गँवावेगा । -भारतमित्र, सन् १९०७ ई० [ ६४३ ]