पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६७३

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गुप्त-निबन्धावली सुट-कविता D कैसी तिनकी गन्ध रङ्ग कैसे कलियनके ? किह प्रकार मन्दाकिनि तहं परवाह बढ़ावत कहां सुधाको भांड, सुधा मुखसों ढरकावत ? मनी कौस्तुभ कहा रङ्ग कसो है ताको केते कोटि विस्व महं रहत उजेरो वाको ? सुन्यो अहै उच्चैनवा अरु ऐरावत तह तिन्हैं हमें दिखारावहु अरु जो कछु है वा महं । अहो देव ! कविराज सदा आनन्द भावमय सुरपुर अरु भूलोक तुम्हारे दोऊ आलय । तव प्रसाद तं तथ्य मर्त्यको सिगरो पायो अब सुरपुरकी कथा सुनन तुम्हरे ढिग आयो । देव ! कृपा करि मोहिं स्वर्गको तथ्य बताओ एकबार अङ्कित करि वाकी छबि दरसाओ। स्वर्ग मर्त्यको ठीक भेद जासों कछ पाओं चिर कलुषित हियको जासों कछु ताप मिटाओं ॥ -हिन्दी बङ्गवासी, ३० जुलाई १८९४ ई० मेक्समूलर किनकी सङ्गतमें बीतत निसि दिवस तुम्हारे कौन तुम्हारे प्यारे हैं किनके तुम प्यारे ? मत भूला, विस्वास करहु तनिकहु नहिं तिनको स्वारथके सब मीत मीत समझे हो जिनको। जाओ वा पुस्तकागारमें सांझ सवेरे मिलिहैं तहं बाप अरु दादाके मीत घनेरे सो हैं सांचे साथी प्रेमी सखा तुम्हारे सांचे उपदेसक सांचे गुरु अरु अति प्यारे। [ ६५६ ]