पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६७६

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शोभा और श्रद्धा परामर्स यह देत सदा सबको हितकारी जो नहिं मानत तिनहूं सों नहिं होत दुखारी । ऐसी इनकी बुद्धि, सरल एती ताहू पर सत्रु होय वा मित्र जात हैं दोऊके घर । कहो कौनको देख्यो ऐसो बाहर भीतर ? ऐसे सांचे कहां मिलहिंगे ! तुमहिं मित्रवर ? सदा दोषसों दूर न व्याप्यो दृपनहू छिन ऐसे सांचे मित्र, मित्र, ! कहुं मिलत भाग बिन ? -भारतमित्र, ३ दिसम्बर १९०० ई. वसन्त । फिर सेमर पलास बन फूले,फिर फूले कचनार । बौरे आम कोइलिया कूकी, आई बहुरि बहार ॥ बन उपवन में फले केते, भांति भांतिके फल । प्रकृति रूप धास्यो कछु और, व्यार बही अनुकूल ।। फिर खेतनमें सरसों फूली शोभा छयी अपार । फिर फुलवारिनमें गंदनकी लगी अनेक कतार ।। चटकत बहु गुलाबकी कलियां सौरभ बिखरी जाय । मधु लम्पट मधुपन ता ऊपर राखी लूट मचाय ।। निरमल चन्द चान्दनी चारहुं ओर दई छिटकाय । रैन दिवस सम भये शीतको कोमल भयो सुभाय ।। कोकिल। फूले बन पलास ऋतुपतिके लागे उड़न निसान। फिर धहराय मलय मारुतके लसकर कियो पयान ॥ [ ६५९ ]