पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६७९

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वसन्त विनोद स्वागत अब आओ श्रीऋतुराज राज, सब साथ लिये अपनो समाज । तब आये सीत चल्यो पलाय, आनन्द गयो चहुं ओर छाय । सब अपने कोकिल ले बुलाय, सबको मन तोपं मधुर गाय । फैलाओ चहुंदिस भ्रमर जाल, गुंजरहिं विपनमें डाल डाल । छोटे छोटे पर फरफराय, लपटं फूलनसों धाय धाय । आवं खंजन लोचन विसाल, नाच सबके मन कर निहाल । फरफर डोलैं मलयज बयार, फैलावत सौरभ बार बार । सोभित हों कमलनसों तड़ाग, चहुं ओर उड़े जिनको पराग । बौराय उठे चहूंदिस रसाल, पुष्पित हों सारे तरु तमाल । फल-पुष्पन पूरित होय देश, धारै धरती नव वधू वेश । हैं जितने सुखके साज-बाज, एकत्र करो इक ठौर आज । कोकिल अब क्यों मौन गही ? बहु विधि फूल विपिनमें फूले मन्द समीर बही । बौराये बहु आम मंजरिन तीखी सान लही। फूल उठे बन उपबन सिगरे उमगी परत मही ।। अपने हाथ बहुरि कुसुमायुध फूल कमान गही। चटक चाँदनी निर्मल चन्दा विरहिन अधिक दही ।। मत्त भई मलयज संग डोलत सौरभ अति उलही। नाचत मोर कीर बहु गावत चाचर होय रही । फूलन फूलन डोलत अलिगन करते चित्तचही । [ ६६२ ]