पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६८०

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बाल-विनोद फूली लता लपटि तम्से कुछ सुग्वकी बात कही ।। तू कैसे चुप साधि रह्यो प्रिय टुक तो बोल सही। शोभा नववसनाकी बनिके आगई नव दुलही । पंचम राग सुना अब प्यारे सुखको सार यही । जौलों रहे वसन्त रहेगो इक तेरो जसही ।। -भारतमित्र, मन् १९०७ ई० बाल-विनोद जरूर कर सकते हो (१) 'कर नहिं सकते हैं' कभी मुंहसे कहो न यार, क्यों नहिं कर सकते उसे, यह सोचो एकबार । कर सकते हैं दूसरे पांच जने जो कार, उसके करनेमें भला तुम हो क्यों लाचार । हो, मत हो, पर दीजिये हिम्मत कभी न हार, नहीं बने एकबार तो कीजे सौ सौ बार ।। 'कर नहिं सकते' कहके अपना मुंह न फुलाओ, ऐसी हलकी बात कभी जीपर मत लाओ! सुस्त निकम्मे पड़े रहें आलसके मारे, वही लोग ऐसा कहते हैं समझो प्यारे । देखो उनके लच्छन जो ऐसे बकते हैं, फिर कैसे कहते हो कुछ नहिं कर सकते हैं ? [ ६६३ ]