पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६८१

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गुप्त-निबन्धावली स्फुट-कविता जो जलमें नहिं घुसे तैरना उसको कैसे आवे, जो गिरनेसे हिचके उसको चलना कौन सिखावे । जलमें उतर तैरना सीखो दौड़ो सीखो चाल, 'निश्चय कर सकते हैं कहके सदा रहो खुशहाल ।। रेलगाड़ी (१) हिसहिस हिसहिस हिसहिस करती, रेल धड़ाधड़ जाती है, जिन जञ्जीरोंसे जकड़ी है उन्हें खूब खुड़काती है। दोनों ओर दूरसे दुनिया देख रही है बांध कतार, धूएँके बलसे जाती है धुआं उड़ाती धूआंधार । आगके बलसे कल चलती है, देखोजी इस कलका बल, घोड़ा टटू जुता नहीं कुछ, खंच रही है खाली कल ।। मात बगृलोंको करती है उड़ती है जैसे तूफान, कलयुगका कलका रथ कहिये या धरतीका कहो विमान । पलमें पार दिनोंका रस्ता इसमें बैठे होता है, कोई बैठ तमाशा देखे कोई सुखसे सोता है। बैठनेवाले बैठे बैठे देखते हैं कितने ही रङ्ग, जङ्गल झील पेड़ बन पत्ते नाव नहर नदियोंके ढङ्ग । जब गांवोंके निकट रेलगाडीको ठहरा पाते हैं, नर नारी तब आसपासके कैसे दौड़े आते हैं। हिसहिस हिसहिस धड़धड़ करती फिर गाड़ी उड़ जाती है, सबको खबरदार करनेको सीटी खूब बजाती है। -भारतमित्र, १० दिसम्बर १९०४ ई०