पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६९०

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हंसी-दिल्लगी फेलाऊं वेद लेके मैं वेदकी दुहाई सब एक करूं बाम्हन मोची हो या कसाई। है कांगरसमें अपनी हर तरहसे रसाई, फिर कनफरंससे हो क्योंकर न धुन सवाई ? आती नहीं है लेकिन तकरीर मुंहजुबानी ! ताबीज गंडे मूली चाहे गलेमें डालं, संध्या करूं तिलक भी माथेसे में लगानू । देवीकी करूं पूजा महावीरका रिझालं, जो कहिये सो कौंसिलमें लिखके तो मैं सुनानू । आती नहीं है लेकिन तकरीर मुंहजुबानी ।। विरह। भाठी सम ताप रह्यो हियरो, हे राम जस्यो सब गात जस्यो । एकबार छुवावत ही तन सों, ____थरमामीटर मुंई फाट ढस्यो । जब डाकरहू हिय हार थक्यो, मरिबो तासों निहचे ठहस्यो। बिरहानल ताप बड़ो सजनी, दावानल सो अब जान पस्यो । या जोबनको लै का करिहों ? चिर दिन याही भांति हाय कह विरहानल महं जरिहों। [ ६७३ ] ४३