पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६९२

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हंसी-दिल्लगी कलियुगके हनुमान । त्रेतायुगमें कूदि पार कीन्ह्यो हम सागर । सीताकी सुधि लाय कियो निज नाम उजागर । उपबन कियो उजार लंकमहं लङ्क लगाई। घी गूदर लपटाय पूंछ चहुंओर फिराई । या कलिमें कहा एतोहू बल हममें नाहीं ? वान्धि पूछ सों वेद पार मागरके जाहीं ? मात समन्दके पार वेदकी उड़े पताका, रोक पूंछ पसार आन धर्मनको नाका । यज्ञ मलेच्छनकी सारी करके भरभण्डा, अपने मुखमहं डारि जाहिं सब मुर्गी अण्डा । कूकर सूकर बीफ सीफ कछ रहे न बाकी, म्वयं होयं तदरूप करहिं ऐसी चालाकी । अहो भ्रातृगण ! बैठ करत क्या सोच विचारा ? मारि एक छल्लाङ्ग करहु भारत उद्धारा ! __-हिन्दी बंगवासी, ८ मार्च १८९७ ई० देशोद्धारकी तान। अल्ला गाड अरु निराकारमें भेद न जानो भाईरे। इन तीनोंको जीमें अपने जानो भाई भाईरे ।। गाड कभी मूरत नहिं पूजी अल्लाने तुड़वाईरे । निराकारने गाली देकर सारी कसर मिटाईरे ।। अल्ला करें न चौका चूल्हा गाड मेज बिछवाईरे। निराकारने देखादेखी अपनी जाति मिटाईरे ।। [ ६७५ ]